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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



बुझते हुए....


नवीन मणि त्रिपाठी



बुझते  हुए  से  आज  चराग़ों   की  तरह  है । 
जो  शख्स  मेरे  चाँद  सितारों की तरह  है ।।

करता है वही  कत्ल मिरे दिल का  सरेआम ।
मिलता मुझे जो आदमी अपनों की तरह है ।।

रह  रह  वो  कई  बार  मुझे   देखते  हैं अब ।
अंदाज   मुहब्बत  के  इशारों  की  तरह  है ।।

कुछ रोज से चेहरे की तबस्सुम  पे फिदा वो ।
किसने कहा वो आज भी गैरों की  तरह  है ।।

यूँ ही न  बिखर  जाए  कहीं  टूट  के  मुझसे ।
नाजुक सा मुकम्मल वो गुलाबों की तरह है ।।

लाती   हैं  हवाएं  भी  नई   जान  चमन   में ।
आना  तेरा  भी  दर पे  बहारों  की  तरह  है ।।

भूला  कहाँ  हूँ  आज तलक हुस्न का मंजर ।
यादों  में  कोई  जुल्फ  घटाओं  की तरह है ।।

आये  हैं  मेरे  घर पे तो  किस्मत है  ये  मेरी ।
यह  वक्त  मेरे  दिल  की मुरादों की तरह है ।।

उलझा हुआ हूं मैं भी जमाने से  अभी तक ।
बेचैनियों   का  दौर  सवालों  की  तरह  है ।।

रखता है सलामत वो मुझे हर बला से अब ।
कोई  तो  निगहबान  दुआओं  की तरह है ।।
           
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