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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



निढाल हूँ मैं


गंगाधर शर्मा 'हिन्दुस्तान'


   

संवेदनाओ का सुलगता ज्वाल हूँ मैं
कटु क्रोध की करवाल को एक ढाल हूँ मैं ।।

हुआ गदगद सिकंदर था जिसे आजाद कर
पोरस ही का वह शोर्य बेमिसाल हूँ मैं

कर्तव्य हित-निज-प्रिय पुत्र की दे दी बली ।
धाय पन्ना का ह्रदय  अति विशाल हूँ मैं ।

भारत की गरीबी दूर कैसे हो सकेगी ।
अब तक निरुतर ही रहा यह सवाल हूँ मैं

बूढ़ा हुआ घोड़ा तो मार दी गोली उसे
देता अब नहीं उसको चने की दाल हूँ मैं ।

विजेता ही जिये ये मेरा कायदा था ।
उफ़ः क्या हुआ,हो क्यों रहा निढाल हूँ मैं ।

‘हिन्दुस्तान’ जब तलवार थामी,राज्य जीते ,
फिर प्रेम-पथ-विजित,हिंद की जयमाल हूँ मैं ।।
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