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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



कल रात...


अर्पित 'अदब'


 

कल रात उस के जिस्म पे अंगड़ाइयों के फूल थे
अफ़सोस है के रात में तन्हाइयों के फूल थे

छाया था उस की उम्र पे जब से जवानी का नशा
चारों तरफ बिखरे हुए रुसवाइयों के फूल थे

आने से तेरे गाँव में बदला हुआ मौसम लगा
कल शाम से ही बाग़ में पुरवाइयों के फूल थे

बाहों में मेरी फूटकर रोया था वो तो यूँ हुआ
एक दूसरे के बीच में गहराइयों के फूल थे

मैं उम्र भर चुनता रहा हूँ बावफा हर राह से
जो डाल से टूटे हुए सच्चाइयों के फूल थे
 

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