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वर्ष: 3, अंक 51,दिसम्बर(द्वितीय)  , 2018



सरकस


सुरेश सौरभ


ब्रह्म लोक में हनुमान जी बहुत नाराज चले आ रहे थे । आते ही राम जी के चरणो में सिर नवा कर बोले- प्रभु जी मैं तो सिर्फ आप का भक्त हूं । साधु हूं । लोग कहते भी हैं जात न पूछो साधु की, पर मुझे जान बूझकर दलित बनाया जा रहा है । चुनाव के पेंच में मुझे कनकैया बना कर लड़ाया जा रहा है। मैं धरती पर इस तरह अपना तिरस्कार कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता । अगर आप ने कुछ नहीं किया तो मैं वही स्टेप उठाऊंगा जो रावण की लंका में उठाया था। तब तक वहीं उदास खड़े अपनी बड़ी-बड़ी दाढ़ी खुजाते हुए जामवंत बोले- मुझे भी भय खाए जा रहा है कहीं बड़ी-बड़ी दाढी़ के कारण मुझे मुसलमान न बना दिया जाए। तब नल नील और अंगद भी राम जी कहने लगे-प्रभु कुछ करें वर्ना बारी -बारी से ये चुनाव वाले हमें उड़ानझल्ले की तरह उड़ाते रहेंगे । बहुत देर तक राम जी अपने भक्तों की फरियाद सुनते रहे। जब सुनते-सुनते उनके कान पक गये तो बोले - मैं क्या करूं जब मुझे ही बरसों से टाट पट्टों में चुनाव वालों ने डाल रखा है। अभी उनका पाप का घड़ा भरा नहीं है । तुम सब धैर्य रखो पूरा पाप का घड़ा भरते ही फूट जायेगा। तब तुम लोगों का हिसाब मैं गिन-गिन कर चुकता करूंगा। तब-तक बस तुम लोग चुनावी सरकस का मजा लो और मौज काटो।


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