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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



जीने दो गम पीने दो


जनकदेव जनक


          
कोई प्यासा रह जाता है उम्र भर के लिए
कोई प्यासा रह जाता है जाम भर के लिए
किसी की ऐसी बदकिस्मती होती है साकी
वह प्यासा रह जाता है उम्र भर के लिए
                                         रात आई है सोने दो खाब आने दो
                                          उनकी यौवन का शराब आने दो
                                          उन्हें आयी है शर्म तो कोई हर्ज नहीं
                                          चेहरे पर रखके नकाब आने दो
है कलियां इतनी राहों में बच बच के चलना मुश्किल है
जिंदगी कोठली काजल की बेदाग निकलना मुश्किल है
आज पीला दो सुला के साकी अपने महफिल में
महफिल से निकला तो कहीं संभलना मुश्किल है
                         पिलाना खूब मुझको मगर बेहोश मत करना
                         गर पी जाऊं तुझको तो अफसोस नहीं करना
                           बड़ी मुद्दत से प्यासे है मेरे होंठ साकी
                          मुझे जहर दे देना मगर खामोश मत करना
बहुत पी चुका हूं आखिरी जाम अभी बाकी है
पीने का आखिरी अंजाम अभी बाकी है
चुका दूंगा हर जाम का दाम साकी
मुझे जहर दे देना मगर खामोश मत करना
                                                       धरती रोती है आसमां रोता है
                                                      इन दोनों के बीच इंसान रोता है
                                                       रह-रह के छलकता है क्यें जाम
                                                      लगता है तेरा जाम भी रोता है
इस बात की मुझे बहुत गम रहता है
वो दूर रहती है जब हसीन मौसम रहता है
बेखुदी में भूल जाता हूं उसको लेकिन
दर्द बहुत होता है जब नशा कम रहता है
                               पीना है न्यामत तो साथ साथ गुनाह भी है
                               गुनाहगार है नजर तो साथ साथ गवाह भी है
                              हर चीज के साथ कुछ खूबी खामी होती है
                              चांदनी गोरी है तो साथ साथ सावली भी है
अंधेरे में लाकर तूने छोड़ दिया
कितना नाजुक था रिश्ता तोड़ दिया
कोई उम्मीद थी और जीना जरूरी था
इसलिए साकी से रिश्ता जोड़ लिया
                            सुबह गुजर गई तो शाम भी गुजर जाएगी
                            इसी तरह हर मुकाम गुजर जाएगा
                            यही गम है कि बेनाम जिंदगी की तरह
                             मेरी लाश भी गुमनाम गुजर जाएगी
झुकी-झुकी सी रात चांदनी उदास लगती है
घुटा-घुटा सा आसमां जमीं उदास लगती है
मैं तो देखता हूं जिधर भी कुदरत को
मेरी उम्मीदों की लाश नजर आती है
                                           हर सुबह की कहीं पर शाम होती है
                                          हर मुसाफिर की कहीं मुकाम होती है
                                          कुछ ऐसे भी बदनसीब होते है जिनकी
                                           हर खोज आखिर में बेनाकाम होती है
अभी अंधेरा है मेरी आवाज को खामोश रहने दो
बहुत दूर सबेरा है मुझे गम में बेहोश रहने दो
कोई दर्द समझ जाए शायद सुबह होने तक
इसी उम्मीद पर मेरी पलकों में ओस रहने दो
                                  क्या पता मौत का पैगाम कब आ जाए
                               जिंदगी की आखिरी शाम कब आ जाए
                               तलाश हमेश करता हूं ऐसे मौको पर
                                मेरी जिंदगी किसी के काम आ जाए
नाजुक सी चीज है कभी भी टूट सकती है
शीशे की तस्वीर है कभी भी टूट सकती है
भरोसा बेकार है इस जिंदगी का दोस्त
नाव कागज की है कभी भी डूब सकती है
                 जिंदगी चलता हुआ चिराग के सिवा कुछ भी नहीं
                  भूल होने पर मुट्ठी भर राख के सिवा कुछ भी नही
                   रंग मौसम का बदलता है आसमां का नहीं
                   जिंदगी जलते हुए बैशाख के सिवा कुछ भी नहीं
जिंदगी में जीने के लिए खाब मिला करता है
हर सवाल का यहां झूठा जवाब मिला करता है
किसे समझ अपना दोस्त किसे दुश्मन समझे
यहां हर के चेहरे पर नकाब मिला करता है
                                                 मैं मर भी जाऊं तो कोई गम नहीं
                                               मेरा जीना भी तो मरने से कम नहीं
                                               क्या फायदा वीरानियों में भटकने से
                                               कोई दोस्त मुकाम नहीं हमदम नहीं
सुबह की ताजी हवा भी फीकी लगने लगता है
इतनी हसीन शराब भी तीखी लगने लगती है
लूट जाती है जब दिल की खुशी व मस्ती
इतनी मुलायम चांदनी भी रूखी लगने लगती है
                                            जुदाई का गम बड़ा तीखा होता है
                                          इस गम में हर मौसम फीका लगता है
                                        कुछ लोग तस्वीर रखा करते है इसलिए
                                         गम भूलाने का अच्छा तरीका होता है
कौन है जो अपनी मंजिल से दूर नहीं
कौन है जो जिंदगी से मजबूर नहीं
गुनाह कौन नहीं करता कभी न कभी
मेरी नजरों में तो ऊपरवाला भी बेकसूर नही
                            गुलों को कैद कर रखा है चमन में खारों ने
                            लहरों को कैद कर रखा है हर तरफ किनारों ने
                            कितनी दूर चली गई थी बच कर चांदनी मगर
                            वहां भी कैद कर रखा है जाकर सितारों ने
चांदनी के चेहरे पर दाग नजर आता है
हर तारा मजार पर चिराग नजर आता है
हर कली पर जो रौनक आई है दोस्तों
किसी मासूम का छीना सुहाग नजर आता है
                                     दामन पर गुनाहों का दाग अभी बाकी है
                                      गुनाहों का गवाह चिराग अभी बाकी है
                                       मैंने डूबा दिया अपना गम तेरे सागर में
                                      कोशिश बाकी है सीने में आग बाकी है
बड़ी किस्मत से गुनाहों का दाग कभी धुलता है
बड़ी किस्मत से मजारों पर चिराग कभी जलता है
यूं तो कितने मरा करते है मुहब्बत में लेकिन
किस्मत से किसी की लाश पर ताज बना करता है
                                          लूट कर लाखों को हमराज बनाया होगा
                                        महज रोटी के लिए मुंहताज बनाया होगा
                                        बहम में आकर शाहंशाह ने एक रोज
                                        लाश पर मुमताज की ताज बनाया होगा
बनाके ताज शाहंशाह ने बड़ा नाम किया है
जिसने देखा झुक कर सलाम किया है
मुझे तो लगता है मुहब्बत में उसने
मौत से खूबसूरत इंतकाम लिया है
                                    हर खत में मुहब्बत का मजबून नहीं होता
                                    हर नजर से दिल का खून नहीं होता
                                   यूं तो चमन के खार हुआ करते हैं बदनाम
                                   चमन का हर फूल भी मासूम नहीं होता
कभी फूलों में लूटा तो कभी खारों में
कभी नफरत में लूटा तो कभी प्यार में
मेरे दोस्त मैं तो उम्रभर लूटता ही रहा
कभी जीत में लूटा कभी हार में
                                     जवानी में सबको किसी से प्यार होता है
                                      इसी उम्र में इंसान को कुछ गरूड़ होता है
                                     जिंदगी में गुनाह लाख बुरी चीज है मगर
                                     हर इंसान इसे करने को मजबूर होता है
तेरे सब्र का बेसब्री से इंतजार करता हूं
किसी उम्मीद पर दिल को बेकरार करता हूं
तुम भूला दो अपने दिल से मुझे लेकिन
मैं तुझे तहे दिल से प्यार करता हू


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