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वर्ष: 3, अंक 51,दिसम्बर(द्वितीय)  , 2018



असली-नकली


डॉ विजेंद्र प्रताप सिंह


ज्‍यों ही महानंदा एक्‍सप्रेस दिल्‍ली से चली जनरल डिब्‍बे में कुछ हिजड़ों की आवाजें सुनाई देने लगी जैसे- पहली आवाज, हाय....हाय...ला रे दे.......अपनी बहन को। दूसरी आवाज,लाओ बाबू जी.......दे दो हमारे तो माई बाप तुम लोग ही हो....। तीसरी आवाज, ऐ चिकने...मेरे सलमान खान....निकाल पचास का.....जल्‍दी ही तुझे कटरीना मिलेगी। तभी दूसरी तरफ से आवाज आई ......मारो....सालों को हमारे इलाके में मांगने आ गए। एक डेली पैसेंजर ने कहा आज फिर नकली असली हिजड़ों में बजेगी....लगता है। गाड़ी गाजियाबाद के यार्ड से निकल ही रही थी कि धायं से गोली चलने की आवाज आई.....एक हिजड़े ने दूसरे समूह के हिजड़ें को गोली मारी.......कटे पेड़ सा गिरा हिजड़ा। तेज होती गाड़ी से साफ दिखाई दे रहा था हिजड़ों का परस्‍पर रक्‍त संघर्ष। बस धुंधला था असली-नकली हिजड़ों का चित्र......यात्रियों की नजर में......कैसे पहचाने.....परिधान सबके एक जैसे, ताली तो सबको बजानी आती है।


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