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वर्ष: 3, अंक 51,दिसम्बर(द्वितीय)  , 2018



सीने में दफन राज


राजीव कुमार


‘‘सीने में दफन राज का अब क्या मोल, जब कसम देने वाला ही इस दुनिया में नहीं है। छिपाने से क्या फायदा? जगजाहिर होना ही चाहिए।’’ ये सोच जुबान बनकर कब से जुम्मन के दिलो-दिमाग से बाहर हाने को आतुर थे। शायद तीन-चार दिन से।

जुम्मन की दीदी की मौत हादसा या साजिश, इसका खुलासा अभी तक नहीं हो पाया है लेकिन इस घटना के लिए खुद को भी गुनहगार मानता है।

जुम्मन जब अपनी दीदी के ससुराल गया तो वहां उसके सामने दीदी और जीजा जी की लड़ाई हुई थी। झगड़े ने ऐसा मोड़ लिया कि बात खुदकुशी की धमकी तक आ पहुंची। दीदी के जोर-जोर से रोने के बाद जीजा जी का गुस्सा शांत हुआ और बात सिर्फ किरासिन तेल छिड़कने तक रह गई।

दीदी ने भी सिर की कसम देकर मुंह बंद कर दिया। जुम्मन की इच्छा कितनी बार हुई कि ये बात सबको बता दे, लेकिन कसम बेड़ी बनकर जुबां तक आ गई।

अचानक एक दिन दीदी, जुम्मन के सामने पड़ी हैं। बदन आग से बुरी तरह झुलसा हुआ है।

दीदी ने अस्पताल मंे जुम्मन से सिर्फ इतना ही कहा कि ‘‘उस दिन वाली बात किसी को मत बताना। कसम को हमेशा निभाना।’’

पुलिस के लाख पूछने के बाद भी दीदी ने आग लेने का सही कारण नहीं बताया और भारतीय नारी की तरह अपने पति पर बिना इल्जाम लगाए दुनिया को अलविदा कह गई।

कसम राज बनकर सीने में ही दफन है। इतना तो जरूर है कि दफन राज, पूरी जिंदगी जुम्मन को दफनानी पड़ी।


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