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वर्ष: 3, अंक 51,दिसम्बर(द्वितीय)  , 2018



नेहपाती...


डॉ० हर्षबाला शर्मा


ख़बर आई थी कि आज सेना शहीदों की लिस्ट ज़ारी करेगी ।सीमा पर युद्ध खत्म हो गया था। देश को विजय हासिल हुई थी पर कितनी जानों की बलि देने पर! उसकी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे अटकी हुई थी। लिस्ट ज़ारी होते ही थाली झन्न से हाथ से छूट गई... मेवर ध्यानसिंह शहीद हुए थे...कुछ क्षण पहले की सुहागन अब राख भर थी...सारी रस्मों में वो ढूँढ रही थी अपनी स्मृतियों के उस दूल्हे को जिससे ज़िद करके बच्चों की तरह लिपट जाया करती थी ''तुम चिट्ठी नहीं लिखते कभी ! लिखो न कितना प्यार करते हो मुझसे।'' वो उसके गालों को छू भर लेता, कुछ कहता नहीं और चला जाता हर बार ...फिर आने के लिए। राधा ने अब लिखने की बात कहना छोड़ दिया था!

इस बार उसका सामान आया था.. दो सैनिक सामान लेकर दरवाजे पर खड़े थे...राधा आँसू रोके साहस के साथ खड़ी थी! सैनिक आर्मी सेल्यूट के साथ मुड़े और चले गए। राधा खुद को रोक न सकी ट्रंक खोलने से। ट्रंक में एक ओर तह की गई उसकी यूनिफ़ॉर्म थी और दूसरी ओर पूरी की पूरी राधा थी...लाल चूड़ियाँ, सिन्दूर, माला, एक सूखा गुलाब और कागज़-कलम़। कागज़ पर जैसे जल्दी में बस इतना भर ही लिखा था ''ज़िद करती रहा करो न ! मेरी नेह पाती पूरा करने की कोशिश में आता रहूँगा बार..बार''।

राधा बिलख रही थी । नेह पाती को आते-आते देर हो गई थी !


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