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वर्ष: 3, अंक 51,दिसम्बर(द्वितीय)  , 2018



आँसू...


डॉ० हर्षबाला शर्मा


उसी रात घोषणा की गई थी कि आतंकियों के ठिकाने का पता लगा लिया गया है। चारों ओर से आतंकियों के ठिकाने को घेर लिया गया था। सैनिकों ने शाम बीतते न बीतते देश के दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे...धाँय...धाँय...धाँय...कुल जमा तीस लाशें थीं...न जाने कितना ही असला, बारूद वहाँ जमा पड़ा था। कई नक्शे थे और थे कई मोबाईल पटे पड़े थे अनजान नम्बरों से! लैपटॉप खंगालने में पुलिस वालों के छक्के छूट गए थे... पर यह तो साफ़ साफ़ साबित हो गया था कि पढ़े-लिखे ये लड़के न जाने क्यों गुनाह और आतंक के रास्ते को ही अपनी ज़िन्दगी भेंट चढ़ा चुके थे।

अगली सुबह लाशों की शिनाख्त के लिए सब के स्केच ज़ारी कर दिए गए थे। न जाने कितने ही लोग आए...लाशों से लिपट कर रोते रहे । कुछ अनजाने ही पड़े रह गए !

शेखू नमाज़ी भी धीमे-धीमे कदम रखे वहाँ आ ही गया। स्केच से तो अशफ़ाक ही लग रहा था। शक्ल देखकर वो न जाने कुछ बुदबुदाया और कदम पीछे हटा लिए ''मैं खुदा से दुआ माँगूगा कि ऐसी औलाद फिर न बख्शे कभी।'' शेखू लौट रहा था लाठी ठेकते हुए ।

अगली सुबह सरकारी बयान जारी हुआ ''ऐसे लोग सचमुच ख़ुदा के बन्दे हैं जो आंतकियों को अपनाते नहीं। वे देश के असली नागरिक हैं।'' चारों तरफ मीडिया के लोग थे। कमरे में बन्द शेखू की आँख के आगे नन्हा अशफ़ाक नाच रहा था! दरवाजा खुला। शेखू खुली आँखों से मरा पड़ा था। एक आँसू उसकी रूह की आँखों में भी था।


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