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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



इंतज़ार


शुचि 'भवि'


   
सुनो
नहीं करना है अब कभी
तुम्हारा इंतज़ार मुझे,
इसलिए नहीं कि
तुम नहीं आओगे,
 इसलिए कि
जानती हूँ मैं
तुम आकर भी नहीं आओगे,,
तुम्हारी प्राथमिकता 
अब भिन्न जो हैं,,,,

सुनो
इंतज़ार फिर भी रहेगा ही
तुम्हारी यादों का
कि
और कुछ है भी तो नहीं
मेरे पास
तुमसे इतर,,,,,,


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