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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



मन का पंछी बोल रहा है!


शशी तिवारी


   
समझाती हूँ त्यागू' दुख को,कर्म कर चलूँ पुनः जगत् में;
करूँ भलाई दुखियारोकी,खोजूं प्रेम शरण आगत में;
आश्वासन दे बार -बार, वह शायद मुझे टटोल रहा है!
किन्तु सोंचती हूँ अब यह,मैं ही त्यागू यदि निज तन-मन;
जग भी वैसा कभी करेगा,झूमेंगा क्या सूना उपवन;
मस्त हो चला अपनें में ही,उलझ गये को खोल रहा है;
मन का पंछी बोल रहा है!
                                     

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