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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



कहाँं किधर ढूँढू


संतोष पाठक


   
कहाँ किधर ढूँढू तुझे ये मन बता ।
हर भाव में मेरे वसे हो ये आकर बता ।।
ह्रदय नदी में तेरी छवि आती रही तेरे आँचल की महक जाती नही 
दिल का दर्द समझाने का नही है पता 
कहाँ किधर ढूँढू-----------------(1)
अक्सर फूल -कलियों से कहने लगे 
मन की टीस कह-कह रोने लगे 
हमसे क्या भूल हुई अव मे तो बता ।
कहा किधर ढूँढू --------------------(2)
तेरे भाव मुझसे मिलने लगे 
हर दर्द को हम तुमसे कहने लगे ,
अव नही मिलने का कोई तेरा पता ।
कहा किधर ढूँढू --------------------(3)
कभी आँखों में आँखें डाले 
अश्रुओं को बहते थे मधुर-मधुर प्याले,
अफ़सोस नजाने क्या हुई हमसे खता
कहा किधर ढूँढू-----------------(4)
अव नही दिखते मधुर स्पर्श तुम्हारे
सव छोड़ गये मेरे सहारे 
आकर अव मुझे न सता
कहा किधर ढूँढू-----------------(5)

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