Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



आँगन भारत माँ का


नवीन कुमार


    
कल-कल करती नदियाँ हो,
और झर-झर गिरता झरना हो ।
अमराई में कोयल की वो,
सात सुरों का गायन हो ।
मैं जहाँ जन्म ले पलूँ-बढ़ूँ,
वो आँगन भारत माँ का हो ।।

जिसकी सरहद की रक्षा में,
खुद पर्वतराज हिमालय हो ।
आदिकाल से स्वार्थरहित,
पदवंदन करता सागर हो ।
मैं जहाँ जन्म ले पलूँ-बढ़ूँ,
वो आँगन भारत माँ का हो ।।

आँचल पर खेतों में फैली,
हरियाली की चादर हो ।
जिस मिट्टी पर मिटने को,
तत्पर कोटि भुजाएँ हों ।
मैं जहाँ जन्म ले पलूँ-बढ़ूँ,
वो आँगन भारत माँ का हो ।।

जहाँ साथ में हिन्दु-मुस्लिम,
सिख-ईसाई रहते हों ।
लोकतंत्र से सजी हो संसद,
शासक जन का सेवक हो ।
मैं जहाँ जन्म ले पलूँ-बढ़ूँ,
वो आँगन भारत माँ का हो ।।

स्वर्ग जहाँ घाटी में बसता,
अमृत गंगाजल में हो ।
केसर की क्यारी की खुशबू,
दसों दिशा महकाती हो ।
मैं जहाँ जन्म ले पलूँ-बढ़ूँ,
वो आँगन भारत माँ का हो ।।		 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें