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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



जिंदगी का सफर


लवनीत मिश्रा


             
बन मुसाफिर घूमता हूँ, 
जिंदगी की राह पर,
रोकना नही मुझे,
तुम आज इस पडाव पर,
बोझ बन गई हैं ,
आज रिश्तों की बोगिया,
ईंजन उत्साह का,
तोडती हैं बोगिया,
भार ट्रेन का यहाँ अब,
क्षमता से पार हैं,
जिंदगी का यह सफर,
रोकना बेकार हैं,
बिन रूके गंतव्य तक,
चल रही हैं जिंदगी, 
ट्रेन जैसी हो गई हैं,
आज मेरी जिंदगी।                                                            

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