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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



"मेरा गाँव अब शहर बन रहा है"


डॉ (श्रीमती) ललिता यादव


           
मेरा गाँव अब शहर बन रहा है
पहले गांव में होती थी हरियाली,
कट गये सारे पेड़ है अब खाली-खाली।
चारों तरफ फैली है सुखी-धरती,
क्योंकि मेरा गांव अब बंजर बन रहा है।
मेरा गाँव अब -----------------------

बच्चे जो बड़ों को दिया करते थे सम्मान,
अब वही बड़ों के सामने चलते हैं सीना तान।
नहीं रह गई लोगों के मन में वो इज्जत,
क्योंकि सबके मन में अब जहर भर गया है।
मेरा गाँव अब---------------------------

पाली जाती थी गाय माता समझकर,
माँस बनाया जा रहा अब उसे काटकर।
पाले जा रहे हैं कुत्ते शहर वालों की तरह,
क्योंकि गाँव मे अब चोरी का डर बढ़ रहा है।
मेरा गाँव अब---------------------------
     
होते थे पहले जो गाँव की चौपाल में न्याय,
पंच परमेश्वर जो नहीं देख सकते थे अन्याय।
नहीं रह गया अब जमाना भी वैसा,
क्योंकि भरोसा भी लोगों को नही रह गया है।
मेरा गांव अब शहर बन रहा है।          
                                                      

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