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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



चुनावी झमेला..


कवि जसवंत लाल खटीक


           
दारू लेके आया बन्दे , वोट लेके जायेगा ।
दो दिन की हाथाजोड़ी , फिर वही झमेला ।।

वो नही रहे नेता , 
जो देश का विकास कराते थे ।
अब तो सारे नेता ,
अपने घरबार बनाते है ।।
डर गयी है जनता सारी ,
और निर्भय हुए नेता ,
दो दिन हाथा जोड़ी , फिर वही झमेला ।।।

इन टूटी सड़को पर नेताजी ,
खूब दौड़ लगा रहे ।
जो कभी नहीं मिले थे , 
आज वो भी गले लगा रहे ।।
हाथाजोड़ी से न माने जनता ,  
तो वो पैरों में घिरेला ,
दो दिन की हाथा जोड़ी , फिर वही झमेला ।।।

वो पढ़े-लिखे घूम रहे , 
नहीं मिला रोजगार जिनको ।
ये चाल है नेता जी की ,  
हमने वोट दिये थे जिनको ।।
कागजों  में नोकरी देंगे , 
और सब बेरोजगार घूमेला , 
दो दिन की हाथा जोड़ी , फिर वही झमेला ।।।

इस चुनावी माहौल में ,
राजा रहना दो दिन का ।
क्यों व्यर्थ गवाया वोट ,
वोट है भविष्य भारत का ।।
वोट देंगे सोच के तो ,
देश सुधर जायेगा ,
दो दिन की हाथाजोड़ी , फिर वही झमेला ।।।

यहाँ लड़ रहे भाई ,
इन वोट के चक्कर में ।
यहाँ बोतले खुल रही , 
देखो चुनावी समर में ।।
रिश्ते लग रहे दांव पे , 
कर देंगे अकेला ,
दो दिन की हाथाजोड़ी , फिर वही झमेला ।।।

ये बहुरूपिये बन्दे ,
ये दिन रात घूमेंगे ।
बहला-फुसला के हमको , 
फिर ये वोट लूटेंगे ।।
बदल लेंगे रंग नेता ,
ये गिरगिट का चेला ,
दो दिन की हाथाजोड़ी ,फिर वही झमेला ।।।

तूने वोट दिया बन्दे , 
दारू और दौलत से ।
इस दारू को तू छोड ,
ये तो बुरी आफत है ।।
रात भर में पलटी होगी ,
बिक रही है जनता ,
दो दिन की हाथाजोड़ी , फिर वही झमेला ।।।

इस वोट पर अधिकार ,
वोट बिन नेता नहीं आता ।
जनता की ताकत वोट ,
वोट बिन कुर्सी नहीं पाता ।।
कहे "जसवंत" जनता से ,
राजनीतिक झमेला ,
दो दिन की हाथाजोड़ी , फिर वहीं झमेला ।।।

दारू लेके आया बन्दे , वोट लेके जायेगा ।
दो दिन की हाथाजोड़ी , फिर वही झमेला ।।

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