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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



तो क्या हुआ


गंगाशरण शर्मा


          
नहीं देखा आंसुओं ने
कभी अपना गमगीन चेहरा
लुढ़कते -गिरते भी क्या
दिखा पाते वो अपना चेहरा
कह गए कोई कहानी, तो क्या हुआ !
स्पर्श तेरा प्यार भरा
 कह गया मानों हजार शब्द
इस नश्वर सी दुनियां में 
न गूंज सका, तो क्या हुआ !
आमने -सामने दर्ज रहा 
एक अजीब दर्द भरा सपना
रहे बिल -बिलाते हो लहू लुहान
जुड़वा था कमो वेश मर्ज अपना 
हम समझा न सके तो, क्या हुआ !
हक है हमें भी यारों 
कुछ डींंगे हांकने  की
बयां उपलब्धियां करू 
क्या कहूं झूठी ही सही 
कूप मंडूकों को आईना 
दिखाया भी, तो क्या हुआ !
हो जाए जो चेतना गूंगी 
शब्द-समूह भी हों विद्रोही
भीतर की तड़प का सन्नाटा 
हो जाता हो  घना, तो क्या हुआ !

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