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वर्ष: 3, अंक 51, दिसम्बर(द्वितीय) , 2018



हाथी दादा


डॉ. प्रमोद सोनवानी पुष्प


    
हाथी दादा बड़े सवेरे ,
निकल पड़े मैदान में ।
लगे काँपनें थर-थर ,थर-थर,
जान नहीं रही जान में ।।1।।

मारे सरदी ठिठुर रहे थे ,
समझ नहीं कुछ भी पाये ।
उठक-बैठक खूब लगाकर,
ठिठुरन को दूर भगाये ।।2।।

इतनें में तो सूरज भैया ,
निकल पड़े आसमान से ।
टा-टा कह जाड़े को दादा ,
उछल पड़े अब शान से ।।3।।		 
 

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