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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

नासमझ लोग हैं......

सुशील यादव दुर्ग

# खून के घूट पीते, जहर जायका जानते काश मेरा यहां तुम ठिकाना - पता जानते # परिंदो को उड़ा के भले मसखरी की यहाँ काश तुम परिंदो को कभी पालना जानते # भूख के ये सताये हुए लोग ये बेजुबाँ रोटियां की दुआ में रहम बाँटना जानते # देख ली आपकी अजब चारागरी आज ही मर्ज भी जान पाते नहीं ना दवा जानते # मन्दिरों में चले जाने से राहतें जो मिली साँस की डूबती नब्ज को आसरा जानते - # लूट कर वो नहीं आयगा देश में भूल से गजनवी सा गजब देश को लूटना जानते # आप ही आप हैं और शायद उधर कुछ नहीं नासमझ लोग हैं ये कहाँ सोचना जानते #

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