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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

यूँ सामने खिड़की के, न भीड़ लगाईये

नरेन्द्र श्रीवास्तव

यूँ सामने खिड़की के, न भीड़ लगाईये। लगाकर के लाइन, फिर एक-एक आईये।। औरों की तरह सिला ,पहन तो ली कमीज। उनकी तरह का तमीज़ भी तो लाईये।। एक का भर गया पेट,एक रह गया भूखा। ठीक नहीं ये बात ,दिल में भी लाईये।। पहले आये कि हक उनका है पहले। पहले चाहिये तो फिर पहले आईये।। इस धक्का-मुक्की, शोर से फायदा नहीं। मजबूरी में खिड़की न बंद कराईये।।

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