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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

चेहरा हर शख़्स का है उतरा

नरेन्द्र श्रीवास्तव

चेहरा हर शख़्स का है उतरा देखिए। रूप जिन्दगी का है बिखरा देखिए।। बल्लम,चाकू चले माँ हो गयी घायल। भाई-भाई से हुआ है झगड़ा देखिए।। खात्मा किया रोशनी का हमने जबसे। किस कदर अँधेरा है छितरा देखिए।। झँझटों ने झुकाया है इस तरह से हमें। हरेक बना बलि का है बकरा देखिए।। जिन्दगी भर वह उघारा घूमता रहा। लाश पे कफन का नया कपड़ा देखिए।।

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