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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

हो गया अवसान

देवेन्द्र कुमार राय

वैरागी सन्यासी को जो हरपल कहता है शैतान, वही चीरहरण करने वाला बन के बैठा है भगवान। सत्ता में कुर्सी के लिए नोच लिए नैतिकता को, ज्ञान के सूरज का लगता अब हो गया अवसान। सोच का सागर सूखा है आर्यावर्त के आंचल से, वरदान नहीं अभिशाप बना पग-पग पर विज्ञान। हर हृदय में मेघ घनेरा ऐसा घोर प्रचण्ड घिरा है, सरल सोच के अग्रिम पथ पर डालता व्यवधान। कहां चलें किस ओर चलें किस कर्म की थामू डोर, विकल हृदय अब राय का सोचे करुँ क्या पान।

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