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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 73, नवंबर(द्वितीय), 2019

एक लड़की का मन

विज्ञा तिवारी "स्वयं"

मन बड़े दिनों से एक गहरी चिंता में डूबा हुआ था कि मैं सही हूं? या हमसे बनने वाला ये समाज? इसी उधेड़बुन में करीब करीब १५-१७ दिन कट गए थे। सेहत भी गिरी जा रही थी। अकेले मैं ही ऐसी लड़की हूं क्या जिसे अपना जीवन अपने आदर्शों की वज़ह से खराब करने का मन है या और भी ऐसी बेवकूफ लड़कियां इस समाज ने पैदा की हैं?

इसी साल जून महीने की बात है जब ज़िन्दगी अलग ही पटरी पर निकल पड़ी। नया नया घर बदला था उसी सब काम में अचानक एक दिन शाम को एक लड़के का फ़ोन आया। काम में उलझे हुए मैंने बड़ी थकान के साथ फ़ोन उठाया। बात हुई तो पता चला कि शादी के लिए फ़ोन था। इससे पहले कई फ़ोन आए होंगे पर मेरे इतने रूखे तरीक़े से बात करने के बावजूद शायद ही किसी ने पलट कर इतने अच्छे से ज़वाब दिया होगा। खैर बाद में बात करती हूं करके उस वक़्त बात को काटना ही उचित लगा। जिस परिवार ने अपनी बड़ी लड़की को कभी भी लड़कियों वाले बंधनों में ना बांधकर अपने मन के सारे काम करने की आज़ादी दी हो, उस लड़की को उसकी आत्मा ही ये अधिकार नहीं देती कि वो किसी लड़के को इसलिए पसंद कर ले क्यूंकि उसे पसंद है। परिवार की मंजूरी ऐसी लड़कियों के लिए आज के समय में भी बहुत जरूरी होती है।

कुछ दिनों तक बातों का सिलसिला और कुंडलियों का मिलान सभी बातें हो गईं थीं। अपने भरसक जितना सच बता सकती थी सब बता दिया। उसने हर बात सुनी और समझी। जो बातें आज भी ब्राह्मण समाज के कुलीन लड़के नहीं समझ पाते वो ये लड़का समझ रहा था। वो मुझे समझ रहा था। घर वाले भी खुश थे की जिस लड़की को उम्मीद ही नहीं थी कि उसको कभी भी अपने मन का लड़का मिलेगा, वो मिल गया था। रिश्तों से डरने वाली उस लड़की ने डरते डरते उस अजनबी साथी के साथ जीवन बिताने के सपने संजो लिए थे।

सब ठीक था और ये क्या सगाई का दिन भी आ गया। मुझे विश्वास ही नहीं था वक़्त और ईश्वर पर की ये दिन मेरे जीवन में भी आएगा कभी। सब अच्छे तरीके से संपन्न हो गया। दोनों नव युगलों का मन किसी अलग ही दुनिया में गोते खाने लगा। अब सपनों ने अलग ही पंख लगा लिए थे पर समस्या ये है कि आजकल की लड़कियों कि भावनाएं अपने प्रेमी के लिए तो वहीं हैं जो आज से १०० साल पहले भी किसी युवती के मन में अपने प्रेमी के लिए रही होंगी परन्तु पढ़ाई लिखाई, असीमित मेहनत, स्वाभिमानी व्यक्तित्व, ये उन्हें प्रेम करने से रोकते हैं।

सगाई के कुछ दिनों बाद जब पता चला कि मेरी शादी में भी लेन देन कि बात हुई है तो मन अथाह खिन्न और दुःख से भर गया। लड़कियों को पढ़ाओ लिखाओ अपने पैरों पर खड़ा करवाओ और फिर एक दिन उनको खुद से अलग करने के लिए बाज़ार में कौड़ियों के दाम बेच आओ। दुःख और अचरज इस बात का था कि माता पिता जिन्होंने यही आदर्श दिए थे वही आज मुझे समाज कि इन रीतियों के आगे झुकते नज़र आए। हमारे समाज ने सिर्फ इतनी ही तरक्की की है अब लड़कियों को पढ़ा लिखा कर कमासुत बना कर ब्याह करते हैं की अगर कल को लड़की को किन्हीं कारणोवश अपने पति से अलग होना पड़े तो कम से कम कमा खा तो ले। जो रिश्ता मैंने सच को बुनियाद बना के गढ़ा था वो तो असल में झूठ के सिक्कों से ढका था। शायद उनको मुझे खुद में सशक्त नहीं बनाना चाईए था फिर शायद मैं अपने आदर्शों को अपने प्यार के बीच नहीं लाती।

पता चलते ही बातों ने अलग रूप ले लिया और दिन प्रतिदिन चीजें थोड़ी और ख़राब होने लगी। सगाई के बाद तय बातों से पीछे हटना ग़लत था, और यही लड़के वालों कि परेशानी का सबब था। पर आदर्शों का भूत तो मेरे सिर पर सवार था और परेशानी सबको हो रही थी। मैं इस बात को झुठला नहीं सकती की उस लड़के से मुझे प्रेम है पर ज़िन्दगी बिताने के लिए मेरे मन में उसके और उसके परिवार के लिए सम्मान होना बेहद ज़रूरी है और अगर ऐसा कोई लेन देन होता है तो वो सम्मान दुबारा जुटा पाना मेरे लिए संभव नहीं था। इसी सब में कई दिन निकल गए थे।

आज मन थोड़ा ज्यादा खिन्न था और बैचैनी का स्तर खुद संभालने योग्य नहीं लगा। सोचा अपनी मित्र से मिल आऊं, बड़े दिन हो गए थे। उसके घर पहुंचे मिले, इतने दिनों की दूरी के बाद भी कुछ बदला नहीं था हमारे बीच। पर यदि आपका मन किसी अलग दुःख में बैचैन है तो अपनी कहने के बजाए आप सिर्फ सामने वाले को सुनते रहना पसंद करेंगे। उसने बताना शुरू किया कि क्या क्या बीत गया इन दिनों। फिर उसने बताया कि किसी जगह उसकी शादी की बात चल रही थी लगभग सब तय था। परिवारों ने आपस में मुलाकात कर ली थी। उसे लड़का पसंद था। लड़का बैंक में क्लर्क के पद पर था। बस लड़के वालों कि इच्छा थी कि शादी में कैश रुपए ५ लाख दिए जाएं। लड़की खुद सरकारी शिक्षिका है, रूपवान है, पढ़ी लिखी, घर के काम में दक्ष पर उसकी बोली लगी ५लाख। उसने ये सब बिना किसी संकोच के कह सुनाया और मैं चुप सब सुन रही थी। उसने कहा जब मैं लड़के से किसी बात में कम नहीं हूं तो दहेज़ क्यूं दूं। उसने आसानी से कह लिया क्यूंकि अभी उसके मन में उस लड़के के प्रति प्रेम का अंकुरण नहीं हुआ था। पर कारण कोई भी हो ये बात उसे भी ठीक नहीं लगी थी।

मेरे दिमाग में एक बात और भी थी लड़का हो या लड़की, सबके मां पिताजी अपने बच्चों को बहुत लाड़ प्यार से पालते हैं। जैसे मेरी मां ने अपने दिन रात मेरी परवरिश में खपाएं हैं वैसे ही लड़के कि माता जी ने भी अपना तन मन न्योछावर किया होगा अपने लाडले पर। जैसे मेरे पिता जी ने अपने भरसक मुझे किसी कमी का एहसास नहीं होने दिया था वैसे ही लड़के के पिता जी ने भी अनगिनत ख्वाब देखें होंगे अपने ज़िगर के टुकड़े के लिए। तो अगर कोई अपने बच्चे की शादी में किसी बात कि उम्मीद रखता है तो ग़लत नहीं है। ग़लत हैं वो लोग जो इन बातों को ग़लत तो समझते हैं पर अंत में उसी बात को हां कर देते हैं। सबको अपने बच्चों की शादी अपनी शर्तों पर करने का अधिकार है, इसलिए बस यही सोच कर रात के ३:३० बजे यही निष्कर्ष निकाला है कि हां प्यार तो है, आदर्श भी हैं, पर फिर भी एक कोशिश जरूर करूंगी कि सबको अपनी बात समझा सकूं। अगर सब समझ पाएंगे तो शायद मेरे प्यार और आदर्शों की जीत होगी और अगर मैं समझाने में असमर्थ रही तो यही समझूंगी की अपने बच्चे पर पहला अधिकार उसके मां पिताजी का होता है और वही अधिकार सदा बना रहे।


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