मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 73, नवंबर(द्वितीय), 2019

खरीददार

राजीव कुमार

सुबह से लोगों का जमघट लगा है, पार्वती चाची के घर के पास। कोई सस्ती कार से उतरा है तो कोई महंगी कार से। सूट-बूट पहने सारे लोग पार्वती चाची जो कि अपनी टूटी हुई खपरैल झोपड़ी के बाहर बरतन मांज रही है, सब उसको उत्सुकता वश निहार रहे हैं। पार्वती चाची तो मग्न होकर अपना काम कर रही है, ’’ आए होंगे किसी काम से , कहीं शादी में जा रहे होंगे। हमको क्या करना है? ’’ यही सोचकर पार्वती चाची एक दो बार तीरछी नजर से उनलोगों के तरफ देखा और अपने काम में लगी रही।

’’ प्रणाम पार्वती जी। ’’ यह आवाज सुनते ही पार्वती चाची ने नजर उठाकर देखा तो एक धनसेठ सामने हाथ जोड़कर खड़ा था।

पार्वती चाची ने हाथ जोड़ते हुए पुछा ’’ कहिए, कुछ काम है क्या? ’’ अपना माथा पीटती है ’’ मै भी कैसा सवाल पुछ रही हुं, मुझसे आपको क्या काम हो सकता है भला? ’’

उस धनसेठ ने कहा ’’ मेरा नाम बद्रीनाथ तीवारी है। इन सबको आप से ही काम है। ’’ पार्वती चाची थोड़ा सोच में पड़ जाती है। ’’ घबराइए नहीं, मेरे पास बहुत रूप्या है। मैं इन सब से ज्यादा रूप्या दुंगा, आप जमीन हमको दे दिजीएगा। ’’ बद्रीनाथ तीवारी ने रूप्यों का बंडल आगे बढ़ाया तब जाकर पार्वती चाची के समझ में सारा माजरा आया।

पार्वती चाची ने कहा ’’ देखिए, आपलोगों को गलतफहमी हुई है। हमको ये जमीन नहीं बेचना है। ये जमीन मेरे पति की निशानी है। अब आप जा सकते हैं और हाँ उनलोगों की गलतफहमी भी दुर कर दिजीएगा। ’’

बद्रीनाथ तीवारी ने दिमाग लगाया और कहा ’’ देखो तुम चाहो तो पूरा रूप्या नगद ले सकती हो। इतने लोगों को नाखुश करके कभ खुश नहीं रह सकती हो और फिर स्वर्ग में तुम्हारे पति भी तो अकेले हैं। ’’

पार्वती चाची ने गरजकर कहा ’’ सारे खरीददार सुन लो रे, इस जमीन के खरीददार सिर्फ मेरे पति थे, हैं और रहेंगे। दूसरा कोई इसका मालिक नहीं बन सकता है। ’’ बोलकर हाथ में तलवार लेकर ’’ जय माँ भवानी । ’’ बोलकर खड़ी हो गई। पार्वती चाची की लाल आँखें देखकर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि आगे बढ़े और बात करे।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें