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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

लो कल लो बात........

वीरेन्द्र कौशल

मेरे दिल से निकले ख्यालात ... करूँ साँझा आपके साथ .... हर तरफ चिंता ही चिंता .... चिंता देखनें में तो अक्षर जोड़ कर बना एक शब्द लेकिन वस्ताव में यह एक शब्द ही नहीं आपितु इस के पीछे पूरा है संसार ज़िसमें जीवन का सार आप सभी होंगें सहमत गर समझेंगे अपनी ज़िम्मेवारी पर चिंता तो हैं स्वाभिक एक लड़की के माता -पिता क्या नहीं हैं चिंता ग्रस्त उसके घर से बाहर कदम रखते ही उनकी चिंता शुरू चाहे वह स्वयं उसे शिक्षा के मंदिर तक छोड़ने क्यों न जा रहे उसकी पढाई की चिंता उसकी छोटी छोटी ज़रूरतें पूरी करने की चिंता अपनी गली मोहल्लें में जहां हम भाई चारे के साथ मिलकर रहते हैं अपनी बच्ची के निकलते चिंता घर आने में निरधारित समय से थोड़ा क्षणिक भी देरी हो जाए तो चिंता फिर समाज में कहावत बेटी का माता - पिता होना सोभाग्य .... किस्मत वालों के आंगन में ही खिलतें हैं ऐसे पौधे बेटी कुछ बड़ी हुई तो चिंता फिर उसकी शादी की चिंता पहले अच्छे वर की चिंता फिर उसे देने के सामान की चिंता फिर शादी पर होने वाले खर्च की चिंता ..... आज के समाज में बेटी चाहे कितनी ही पढ़ा दो पर बिना दहेज के ब्याह के तो दिखा दो फिर कहते हैं काहे की चिंता ..... हर तरफ चिंता ही चिंता ..... चिंता ही चिंता ..... चिंता ही चिंता ....


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