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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

औरत सिर्फ औरत ही रह गयी

वर्षा वार्ष्णेय

जिंदगी को जब भी आवाज दी हमने हसरत से , न जाने कहाँ आवाज गुम हो गयी । बहक गए रास्ते भी चलते हुए , मंजिलों की सरहद भी खो गयी । फर्ज और ईमान की तलब ने यूँ खामोश कर दिया , आँसूओं की बाढ़ में लेखनी भी बह गयी । जज्बात को यूँ धूल में उड़ाने वालो , देखो आज वो कलम जैसे शब्दविहीन हो गयी । साजिशें तो लिखी थीं वक़्त ने मेरे खिलाफ , उम्र की सफेदी में जाने क्यों बेरहम आत्मा हो गयी । चलो छोड़ो उम्र और जज्बात की वो पुरानी दास्तान , आज भी औरत सिर्फ औरत ही रह गयी।

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