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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

रिक्त

तनुजा नन्दिता

समय के साथ चलती रहती खींचा-तानी.. कभी रहती पास.. तो कभी करती आना-कानी... सन्नाटा छा जाता इक वक्त... मन सूना औ इकटक निहारते आसमां... करते है स्वयं में शून्य का आकंलन अपने होकर भी करीब तन्हाई बन जाती रकीब आईना का झूठ औ सच हमेशा मुस्कुरा के कहें.. ढूढंता हूँ टूटता बस इक तारा बेबस मन मेरा लगता बेचारा शर्मिन्दगी नही, बस कटु है मानसिक पीड़ा लिए मौन की अभिव्यक्ति कुछ अहस्सासअधूरे...औ सपने कभी न होते पूरे.... खामोशी की सदा यही कहती कि नंदिता रिक्त हूँ कही.. अपने जीवन में... फिर भी अस्तित्व में बढ़ती हूँ शनै-शनै ..!!


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