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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

ये दिन काश .....

सुशील यादव दुर्ग

दिलकश कई नजारे होते ये दिन काश हमारे होते अपना भी परचम लहराता आसमान खंगारे होते पहुंच थी जितनी हाथों की उतनी अक्ल उतारे होते हम जुगनू पर मर-मिटे रहे कहाँ पसन्द में तारे होते नादान बने हम सालों तक सदियाँ यहीं गुजारे होते बालों मेरी सफेदी कहती सभी समुन्दर खारे होते तुमसे दिशा बोध ना होता पथ भटके बनजारे होते मुझको फँसना अच्छा लगता शब्द जाल तुम्हारे होते

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