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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

विछोह की पीड़ा

सौरभ कुमार ठाकुर

पता नही किस शहर में, किस गली तुम चली गई। मै ढूँढ़ता रह गया,तुम छोड़ गई । पता नही हम किस मोड़ पर फिर कभी मिल पाएँगे । इस अनूठी दुनिया में फिर किस तरह से संभल पाएँगे । पता नही तेरे बिन हम, जी पाएँगे या मर जाएँगे । हम बिछड़ गए उस दिन,जिस दिन तुम मुझसे मिलने वाली थी मै तुमसे मिलने वाला था । इस अंधी दुनिया ने कभी हमको समझा ही नही । काश समझ पाती दुनिया, तो हम कभी बिछड़ते ही नही । प्यार करते थे हम तुमसे, पर कभी कह ही न पाएँ । आज भी सोचता हूँ की, काश वो दिन वापस लौट आए । बहुत समय लगा दिया हमने इजहार में । कब तक भटकेंगे हम तेरे इन्तजार में । हम बिछड़ गए थे उस दिन,जिस दिन, तुम मुझसे मिलने वाली थी, मै तुमसे मिलने मिलने वाला था ।


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