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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

बचपन

राजीव डोगरा

वो बचपन वो नादानियाँ न जाने अब कहाँ चली गई, घूमता फिरता था जहाँ वो हसीन वादियाँ भी न जाने अब कहाँ चली गई। बैठ जिस नदी किनारे करता था अठखेलियां वो नदी भी न जाने अब कहाँ चली गई, वो आम का वृक्ष बैठ जिसके नीचे देखता था अंबर और अवनि को वो वृक्ष भी न जाने अब कहाँ चले गए। एक सखी थी बड़ी प्यार सी एक सखा था बड़ा नटखट सा मिल तीनों करते थे। बड़ा धूम धड़ाक पर न जाने समय के पांव के संग अब वो कहाँ चले गए न अब बचपन रहा न अब नादानियाँ रही दोनों मिल अब न जाने कहाँ दूर चले गए।


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