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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

पेड़

पुष्पा मेहरा

जन्म से लेकर मृत्यु तक युगों से काम ये आते हैं गहरे सागर और नदियों में इनसे ही किनारा पाते हैं | पहलू जीवन का ऐसा कोई बचा नहीं जिसे लकड़ी ने कभी छुआ नहीं इसीलिये तो कहती हूँ सदा - मानव –जीवन का आधार हैं ये प्रकृति का तो शृंगार हैं ये | जब इन पर पत्थर पड़ते हैं ये फलों की बरसा करते हैं इनकी तरफ़ जो हाथ बढ़ाते हैं उन्हें फूलों का दान ये देते हैं, मन ख़ुशबू से भर देते हैं | प्रकृति विनाशक मानव को रक्षक बनने की शिक्षा देते हैं क्रूर- कठोर मनों को ये नम्रता की शिक्षा देते हैं | नफ़रत से भरे इंसानों को ये प्यार की शिक्षा देते हैं | धरती का सारा विष पीकर ये हमको जीवन देते हैं | शीत, वृष्टि धूल –धूप सह कर ये छाया शीतल देते हैं बिन पैसे ,बिन उधारी की ये विश्राम स्थली बन जीते हैं , सबकी सुनते चुप ही रहते झगड़ा न कभी करवाते हैं | इसीलिये- मत काटो इन्हें मत मारो इन्हें सचमुच जीवन का आधार हैं ये |


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