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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

क्या जानूं ...!!

डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प'

आज उसे फिर बुलाया, विचारों के झकझोरते अंधड़ ने खलबली मचाई। अनगिनत तीखी कीलों से प्रश्नों को उछाल मनस ने चाहत की हथौड़ी ले मस्तिष्क में गहराई से गाढ़ते अनवरत ठक्क-ठक्क लगाई। कि.... दिमाग़ की छोटी-बड़ी रग-रग ज्यों फटने को आई। ओ माँ !.... बस एक हाँक पर आई दौड़ी; अछूते कोने में मन के हाथ-पाँव चल पड़े मन्त्रवत घी-गेहूँ को धीमी लौ पे तपाया, भवों-माथे-कनपटी-खोपड़ी पे वैसे ही अँगुली पोरों से सहजे-सहजे लगाया, आँखों में सकून भरा, मस्तिष्क में भरी ठंडक झपकी में तैर गई वही छवि जिसने छुटपन में मयादी-बुखार से खोखल हुए मस्तिष्क में मेरे भरी थी ठीक ऐसी ही ठंडकयुक्त सचेतनता। रातभर जागती वही सुदृढ़ छवि कैसे अँगुली पोरों में सहजे ही बस गई। क्या जानूं??


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