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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

मस्तिष्क का शून्य

डा॰ नितिषा श्रीवास्तव

अब शून्य है व्योम, है स्थिर सी धरा, ढ़ह गयी पर्वतों की शिला, सूर्य भीगा सा है पड़ा। ठहरा है समीर, बिन मकरंद के, भ्रमित हैं भ्रमर, भ्रमित है दिशा। उग रही है निशा, दिन ढल सा गया, चेतना का धुआँ, अग्नि में जल गया। आसुओं की नदी, बाढ़ में है फसी, एक दिन में कई, सदिया ढल गयी। जीवन मृत सा हुआ, मौत जीवित सा है, शांत हो हर ध्वनि, आत्मा में छुपी। अब नहीं ओर है, न कोई छोर है, अब विकेंद्रित सभी, केंद्र की कोह में। रश्मियों की लड़ी, उलझनों में फसी, खत्म है दायरे, शेष सब रास्ते। दीप मन का बुझा, अब न कुछ शेष है, जो बचा अवशेष है। जो बचा अवशेष है।।

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