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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

चलो आज उन बचपन
के दिनों में फिर खो जाए

डा॰ नितिषा श्रीवास्तव

1 चलो आज फिर कुछ बचपन से सीख लिया जाए। क्यूँ न बेवजह दिल खोलकर हँस लिया जाए, कुछ पाने के लिए क्यूँ न खूब रो लिया जाए,, क्यूँ न आज किसी गैर पर भी भरोसा कर लिया जाए॥ 2 चलो आज फिर से बचपन जी लिया जाए। क्यूँ न आज फिर गुड्डे-गुड़ियों से खेल लिया जाए, कुछ पल उन मिट्टी के घरौदों में गुजार लिया जाए,, अपने बीते बचपन से अपना आज संवार लिया जाए॥ 3 चलो आज किसी का बचपन संवार दिया जाए। किसी की नन्ही उँगलियाँ थाम कुछ कदम चल लिया जाए, किसी की मासूम अटखेलियों से थकान दूर कर ली जाए,, किसी की तोतली जुबान से कोई गीत सुन लिया जाए॥ 4 चलो आज कुछ बातें बचपन की कर ली जाए। कागज़ की कश्तियों और फिरकियों में जी लिया जाए, मोहल्ले की हर तंग गलियों से गुज़र लिया जाए,, माँ की लोरी से रातों की धुन बुन लिया जाए॥ 5 चलो आज कुछ किस्से बचपन के सुन लिया जाए। भूतों की बातों से डरकर चादर में छुप लिया जाए, जलती दोपहर में नंगे पाव छत पर चल लिया जाए,, गेंद वापस लाने के लिए किसी की छत लाँग ली जाए॥ 6 चलो आज बचपन के जैसे कुछ सयाने बन जाए। पापा के कहने से पहले ही किताबें खुल जाए, इन नन्हें हाथों से घर के कुछ काम तो निपटाए,, चलो आज उन बचपन के दिनों में फिर खो जाए॥

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