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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

आज का सत्य

डॉ॰ मोहन सिंह यादव

हम शहरी हों या देहाती , सब में धोखा ही रहता है , कुछ अधिक चोरियाँ करते हैं , कुछ कम लुटेरे होते हैं , पर यही सत्य तो होता है , कि सभी चचेरे होते हैं | कुछ अधिक दर्द तो देते हैं , कुछ कम दर्द कर देते हैं , पर अंतर क्या है ? सभी दर्द तो देते हैं , सब प्रेम – प्रीति की बात करें , सब अंत में धोखा देते हैं | कुछ आहें भरते मिलते हैं , कुछ हँसते – हँसते मिलते हैं , कुछ ठंडी हवा में बहके हैं , कुछ गर्म हवा में जलते हैं , सबकी यारों क्या कहना ? हम धोखा ही में पलते हैं | छोटा हो या बड़ा हो , सब सत्य एक सा होता है , कुछ सत्य आप के पास है , कुछ सत्य हमारे पास | पर फरेब यह क्यों ? कुछ झूठ हमारे पास है , कुछ झूठ आप के पास |


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