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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

हमसफर

डॉ॰ मोहन सिंह यादव

. ये दिल तू जवां है , तेरी जवानी का क्या | हर दिल झुक गया , तेरी पानी का क्या || जवां हो हर जख्म , नया करते हो | थम जा , बेहिसाब किये चलते हो || ये दर्द देने वाले , दवा भी दिये जा | बहुत मुश्किल हो गया , मैं दीवाना हो गया || जिन्दगी बहुत कुछ है , हम भूल जाते हैं | हम ऊधर जाते हैं , जिधर भूल जाते हैं || हम तनहाँ ही काँटे हैं , दिन इंतजार के | कभी तो मिल लिया करो , बिना प्यार के || झूठा ही सही , इकरार कर लो | फूल ना सही , काँटे ही दे दो दिल को || एक मुद्दत के बाद , मुस्कराये हो | फिर धोखा या प्यार का इरादा है || जवानी जिन्दाबाद तो , जहर की जरूरत नहीं होती | जहर की हकीकत , मुसीबत में होती है || आंसूओं के डर से , मैंने भी रोना छोड़ दिया | दुनिया के डर से , तूने भी मिलना छोड़ दिया ||


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