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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

सीता श्राप

लवनीत मिश्रा

विहार सखी संग करे सिया, सुने शुक की बात, बगियन में वो जप रहे थे, राम नाम की थाप, रामायण की लीलाओं का, करे खूब बखान, कौमारी उस सीता को, नही राम का ज्ञान, कहे सखी से तब सीता, इन पक्षियों को ले आओ, जब तक जानू रहस्य यह, तब तक कैद सुनाओ, पकड़ शुक को सिया तभी, पूछे सब वृतांत, कौन राम कैसा रामायण, जिसका करे बखान, कहे शुक हम आश्रित हैं, रटते हैं ईश्वर ज्ञान, समयपूर्व ही लिख डाला, मुनि ने मंगल काम, उत्सुकता में राम मिलन के, सिया करे फरियाद, कैद रखो शुक जोड़े को, जब तक ना हो सच बात, कहे दुखी हो शुक तभी, हमको कर दो आजाद, हठ ना कर तू हे देवी, शुक पत्नी गर्भ के साथ, ना माने जब सीता तो, शुक पत्नी देती श्राप, तू भी सहकर यह वियोग, काटेंगी दिन और रात शुक बोलें मै अवधपुरी में, त्याग दूँ अपने प्राण, पुनः जन्म ले इस धरती पर, निमित बनू सच जान, दोनों शुक जोडे ने तब, छोड़ दिया शरीर, वही शुक धोबी बनकर, बने सीया की पीड़।

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