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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

और कोई कामना नहीं

कुंदन कुमार

इस भोले ह्रदय की, है कोई कामना नहीं सिवा तेरे इस मन की कोई आराधना नहीं मैं ये जनता हूँ, कि तू ही मेरी है जिंदगी यकीं न कर पर सच है, कि तेरे बिन कोई ठिकाना नहीं इस भोले ह्रदय की है, कोई कामना नहीं अज्ञान नहीं हूँ, जनता हूँ मैं सबकुछ तू भी तो ज्ञानी है, मानती है सबकुछ क्या मैं या तू अपने मन की महक भूल पाएंगे? तू जानती हो शायद, मुझे आता दिल को बहलाना नहीं इस भोले ह्रदय की, है कोई कामना नहीं क्या पाया जो चाहती दरकिनार कर देना मुझे पहाड़ों से पत्थरों सा होगा न लुढ़कना तुझे मैं छोटा सही, थामें तुझे न गिरने दूंगा है प्रेम अति, पर दुःख की, आता मुझे दिखाना नहीं इस भोले ह्रदय की, है कोई कामना नहीं चाँद सा चलता रहूं रौशन किये राहों को मैं देखता रहूं तुम्हें, थामे तेरी बाँहों को मैं अवहेलना ये जग की, तेरे लिए हंस के सहूँ इसके सिवा जीवन में कोई उपासना नहीं इस भोले ह्रदय की, है कोई कामना नहीं तू खो जाये यदि, तम गहन छा जायेगा मेरी कौमुदी! मेरे बिना तू भी तो मुर्झायेगा संग यदि दोनों चले सौरभ ये नभ बरसायेगा बिछड़ के जीवन में मंजूर मुझे वीराना नहीं इस भोले ह्रदय की, है कोई कामना नहीं

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