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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

प्रतीक्षा है, नये युग की..!

ज्योति मिश्रा

टूटती साँसे, बिखरता ख्वाब, अधरों तक आ के ठहरे, वो अनकहे, अधूरे जज्बात, चुप... बिल्कुल चुप, शांत... बिल्कुल शांत, समंदर, लहर, किनारा, और हृदय के धक - धक की वो आवाज, मद्धम रोशनी चांद की, उस शीतलता में छिपती उसकी परछाई, मानो घुल सी गई हो, रंगों में नीर की तरह, बिखरने के लिए, किसी कैनवास पर, सुर्ख, चटक, कहीं उजला सा, एक आकार, निर्विकार सा, एक पथ, जिसके गंतव्य का पता न हो, अंतरिक्ष के उस पार, पलायन वेग की सीमा से परे, अंतहीन, उदासीन, कभी परावर्तित न होने वाले वो क्षण, ज्ञात है क्या तुम्हें वो पथ? स्वयं से परमात्मा में समाहित होने का, स्वयं से स्वयं को पा लेने का, ज्ञात है तुम्हें क्या वो पथ? जकड़ती जंजीरें, नियमों की, परम्पराओं की, कभी सुलगते, कभी धीमे पड़ते, विचारों से गुथे, ज्वालामुखी से वो उद्गार, प्रतीक्षा है, उसके सुषप्तावस्था के समाप्ति की, उसके लावे से विनाश होते, इन आडम्बरों की, प्रतीक्षा है, एक नये युग की, कैद कर सकती हूँ, परंतु नहीं... अभिलाषा है, इनकी मुक्ति की, डर, झूठ, दोगलेपन, स्तरता से जकड़े, इन प्राणियों की, प्रतीक्षा है एक नए युग की, उज्ज्वल, निर्मल, निश्छल, निरपेक्ष भावनाओं की, अंत और ठहराव के बाद, एक नये शुरुआत की, प्रतीक्षा है, एक नये युग की....!!


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