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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

क्या है मेरा जुर्म

चंद्र मोहन किस्कू

कॉलेज से लौटते समय जिसे मिला था सड़क किनारे उसका देह मुरझा गया था दर्द से कराह रहे थे खून से कपड़ा भींग गया था देह में उसका यहाँ- वहाँ चोट का निशान था उसे देखकर मेरा आँसू निकल आया था खड़ा नहीं हो पाया भागना चाहा था वहाँ से इतने पर अस्पष्ट स्वर में सुनाई दिया -- "भाई मुझे बचा लो" कदम मेरा रुक गया धर्म की बातों को याद किया और उसे लेकर गया अस्पताल . चलो तुम ही कहो मुझसे क्या भूल हुई ? मेरा जुर्म क्या है ? अर्धरात्रि के समय जब पूरी दुनिया नींद की दुनिया में जाती है ठीक वैसे ही समय हमारे 'टाटी सिलपिन्ज' में दस्तक हुआ दरवाजा धकेलने की आवाज बढ़ने लगी कान में बहुत बुरा सुनाई दिया नींद मेरा टूट गया देखा काला और हरा कपड़ा पहने दो- चार लोगों को बोले मुझसे -- चलो हमारे साथ तुम माओवादी हो कल लैंड माईन की विस्फोट कर ग्यारह जन पुलिस की हत्या किए हो हाय रे कपाल मेरा --- आज तक माओवादी ही न देख पाया और इधर मैं बड़ा माओवादी हूँ यह मुझे ही मालूम न हुआ . जेल से कल ही आया हूँ अदालत की विचार से बेगुनाह साबित हुआ . * टाटी सिलपींज एक संताली शब्द है जिसका अर्थ बाँस का बनाया हुआ दरवाजा .


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