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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

आज अचानक जीवन मेरा हो उठा हाय! पराया रे।

अरुण कुमार प्रसाद

पल वे जेहन में कौंधे सब जिसने स्वप्न दिखाये थे। अथक परिश्रम करता आया सपने तब भी हारे थे। वर्षा,जाड़ा,गर्मी,आंधी सब मन,तन पर झेला था । सुविधाओं को त्याग,ललक कर कर्म और कर्त्तव्य किया। पास दृष्टि के विधिवत रक्खा लक्ष्य लाल से इंगित कर। डाल हाथ में हाथ मूर्तिवत कभी मौन मैं रहा नहीं । कभी न सकुचाए ‘अंतर’ से कर्मभूमि में मैं उतरा। बार-बार कर भेद तर्क को, मैं दिमाग को परे रखा। दिल,दिमाग के तीक्ष्ण द्वंद्व में,मैंने दिल का साथ दिया। आँखों से कहकर मैंने ही इस दिमाग को मनवाया। मौन और विद्रोही होकर मैंने मुझको छोड़ा था। अब जब कौंध रहा है सबकुछ विवश मैं शीश झुकाये रे। मैं अब उद्धत मुझे छोडकर जाने को आतुर सा हूँ। पुन: द्वार पर आया देखूँ ‘मैं’ मुझको मंत्र सिखाने को। चाहत को अनजाना कह दूँ,नजर चुराकर विदा करूं। और रुलाई,क्षोभ,लोभ सब दूर हटे कुछ सदा करूं। पंखों वाली चिड़िया के पर कुतर दिये थे मैंने ही। सारे नभ को चीरचार कर नष्ट किये थे मैंने ही। अब उड़ान जैसे शब्दों का अर्थ समझकर करना क्या? पथ,पथचर जैसे शब्दों के अर्थ समझकर करना क्या? अँधियारों की बस्ती में आकर ढूँढ ऊजाला थक जाना। खुद का शव खुद ही घसीटना और हाँफना थक जाना। किरण नहीं अब कहीं दिखेगा और नहीं बिखरेगा ही। जिसको विधि ने विधिवत् सौंपा, सोचा! यही करेगा क्या? आज अचानक जीवन मेरा हो उठा हाय! पराया रे।

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