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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

हमें प्रफुल्लित होने दो

अरुण कुमार प्रसाद

इतिहास से बादल छंटने दो. पूर्वजों को पुनर्जीवित होने दो. संस्कृतियों से हर भ्रम सभ्य त्रुटियों को बेनकाब होने दो. पूर्वजों के होने से हमारा खंडहर ढहेगा. खंडहर यूँ ही नहीं ढहता. नया होने का ललक जब होता है तब खंडहर ढहता है. विसंगतियों से भरे समाज में खंडहर मुकुट होता जा रहा है. हम जब मुकुटों में तलासने लगें खुद को तो अपने आप को खो देते हैं. हम पिघलने के बजाय बर्फ में हो रहे हैं परिवर्तित. नदी बनने के बजाय तालाबों में हो रहे हैं परिवर्तित. सड़ने के लिए तत्पर लोग सूरज को उतारना चाहता है परिवर्द्धित होने का संकल्प पाले. इतिहास में सिर्फ युद्ध है. वीर गाथाएं. आम आदमी का दु:ख,दर्द, संकल्प या आकांक्षाएं विचार या व्यवहार व्यक्तिपरक सम्बन्ध या सम्पर्क या सामूहिकता की प्रतिबद्धता छिड़का हुआ भी नहीं है. संस्कृत किसकी भाषा है पूर्वजों से पूछ लेंगे. उसे पुनर्जीवित होने दो. उनके पुनर्जीवित होने से हम शायद जन्म लें प्रफुल्लित होने. हमें प्रफुल्लित होने दो.


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