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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

सागर से दिल

अनिल कुमार

सागर सा गहरा है हर दिल का राज़ असंख्य रहस्यों से भरा शांत है ऊपर की सतह अन्दर तूफानों का सैलाब गहराइयाँ कितनी यह कोई नहीं है जानता उन राज़ के कई हिस्से बादलों को उठते कुछ क्षण उठते-गिरते पानी की बून्दों से और मिल जाते उस गहराई में नापा किसने है सागर को जो दिल के सागर का अनुमान है पाता सागरे से तूफानों में उठकर वो राज़ है सो जाता अनन्त सीमाओं में बँधा हुआ हर दिल सागर सा अन्दर की गहराई में जाने कितने राज़ बनाता पंछियों का कलरव दूर क्षितिज तक गुंजयमान कर उठता हर दिल की गहराई को कुछ क्षण फिर शांत सा होकर वापस खो जाता सागर के सन्नाटे में गिरती-उठती लहरों से कभी-कभी अभिव्यक्ति पाने को वो राज़ जो दिल के उछलकूद भी करते पर बून्दों का जीवन कुछ पल लेकर सागर के तट का सहारा लौट के गहरा सागर के असीमित जल में वही राज़ फिर दिल के लेकर सागर छिप जाता।


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