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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

अपनों की बिछुड़न

अनिल कुमार

कितना दुखान्त होता है वो मंजर अपना बिछड़ के भी अन्दर रह जाता है कुछ आँखों से आँसू गिरते है पाने को एक झलक नजरें भी इधर-उधर सिहरती है अबोध बच्चे-सी हालत में कोई मन बिलखता रह जाता है खूब छटपटाकर कुछ-कुछ पागल-सा हो एक खंजर-सी पीर भीतर ही भीतर लेकर रह जाता है कितना दुखान्त होता है वो मंजर अपना बिछड़ के भी अन्दर रह जाता है स्वप्न देखता निद्रा में वो जब बिछड़ने वाले को पाता है सच कहता हूँ कितना बेबस और लाचार तब एक आदमी हो जाता है।


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