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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

तुझे पराया करना चाहता हूँ

डॉ० अनिल चड्डा

तू मेरी बेटी है तुझे पराया करना चाहता हूँ जिस पौधे को यत्नों से सींचा उसे दूजों को देना चाहता हूँ तुझे मेरी मजबूरी समझ आये न आये फिर भी कहना चाहता हूँ यही दस्तूर है दुनिया का उसे बरकरार रखना चाहता हूँ भूल जाना प्यार माँ-बाप का जो प्यार हमने तुझको दिया उसे सब में बाँटना यही मैं चाहता हूँ यही आधार है हरेक रिश्ते का जो रिश्ते बनायें हैं तूने प्यार की माला में पिरो कर मेरे प्यार का तोहफा मुझे लौटाना यही मैं चाहता हूँ


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