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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

शांति की आवाज

अजय अमिताभ सुमन

किसी मनोहर बाग में एक दिन , किसी मनोहर भिक्षुक गाँव , लिए हाथ में पुष्प मनोहर , बुद्ध आ बैठे पीपल छाँव . सभा शांत थी , बाग़ शांत था , चिड़ियाँ गीत सुनाती थीं . भौरें रुन झुन नृत्य दिखाते , और कलियाँ मुस्काती थी . बुद्ध की वाणी को सुनने को , सारे तत्पर भिक्षुक थे , हवा शांत थी ,वृक्ष शांत सब, इस अवसर को उत्सुक थे . उत्सुक थे सारे वचनों को , जब बुद्ध मुख से बोलेंगे , बंद पड़े जो मानस पट है , बुद्ध निज वचनों से खोलेंगे. समय धार बहती जाती थी , बुद्ध मुख से कुछ न कहते थे , मन में क्षोभ विकट था सबको , पर भिक्षुक जन सहते थे . इधर दिवस बिता जाता था , बुद्ध बैठे थे ठाने मौन , ये कैसी लीला स्वामी की , बुद्ध से आखिर पूछे कौन ? काया सबकी भाग में स्थित , पर मन दौड़ लगाता था , भय ,चिंता के श्यामल बादल , खींच खींच के लाता था. तभी अचानक जोर से सबने , हँसने की आवाज सुनी , अरे अकारण हँसता है क्यूँ , ओ महाकश्यप, ओ गुणी . गौतम ने हँसते नयनों से , महाकश्यप को दान किया , निज वन में जाने से पहले , वो ही पुष्प प्रदान किया . पर उसको न चिंता थी न, हँसने को अवकाश दिया , विस्मित थे सारे भिक्षुक क्या, गौतम ने प्रकाश दिया . तुम्हीं बताओ महागुणी ये , कैसा गूढ़ विज्ञान है ? क्या तुम भी उपलब्ध ज्ञान को , हो गए हो ये प्रमाण है? कहा ठहाके मार मार के , महाकश्यप गुणी सागर ने , परम तत्व को कहके गौतम , डाले कैसे मन गागर में . शांति की आवाज सुन सको , तब तुम भी सब डोलोगे , बुद्ध तुममें भी बहना चाहे , तुम सब मन पट कब खोलोगे?

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