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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

फतह

मनोज जैन मधुर

फतह किया राजा ने एक किला और। दिग्विजयी होने का भाव छटपटाया। प्रतिरोधी आँधी को राव ने दबाया। अब भी है समय हमें मानो सिरमौर। रणभेरी बजी खूब देखकर सुभीता। कुटिल चाल चली युद्ध राजा ने जीता। परजा ने फिर ढूँढा एक नया ठौर। क्षत्रप सब राजा के संग साथ नाचें। परजा के हाव-भाव एक एक जाँचे। आया जी चमचों का कैसा यह दौर। हँसी-खुशी आका को बोलो कब भाती। राज करो फूट डाल नीति ही सुहाती। बात रही इतनी सी फरमाना गौर। कौन यहाँ सच कहने सुनने का आदी। पीटे जा राज पुरुष जोर से मुनादी। पसरेंगे पैर नहीं छोटी है सौर! युग बीता अच्छा दिन एक नहीं आया। ज्ञानी ने मूरख को स्वप्न फिर दिखाया। भूखों को घी चुपड़े डाल रहा कौर।


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