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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

नदी !

डॉ. मनोहर अभय

नदी ! मेरे गाँव होकर आना इधर सिमाने पर मिलेंगीं छोटी- बड़ी पथवारियाँ दूध- पानी चढ़ातीं सुहागिलें क्वारियाँ पानी तलासते ऊसर | स्वागतम में खड़े होंगे सूखे आम जामुन बेर उनींदी आँख मलती जागती देर से सवेर दम तोड़ती पोखर | कमर टूटी हवेलियों की टखने बचे सावंत के मुठ्ठियों में लिए फिरते वायदे वसंत के बाँटते मीठा जहर | बाग़ हैं बबूल के हवाओं में तपन गहरी काटने को दौड़ती बावरी सी दुपहरी काम करते खेतिहर| ऐ! नदी फैलाना नहीं खुली लम्बी आस्तीनें हथेलियों से पौंछना सदियों पुराने पसीनें खुशियाँ मनाएँगे पसीजते हलधर |


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