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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

कुछ भी न हासिल होगा

डी एम मिश्र

क़िताबें पढ़ के चार कुछ भी न हासिल होगा पढ़ा़ न प्रेम का जो पाठ क्या काबिल होगा मैंने सपने में भी ऐसा कभी न सोचा था जिसे मासूम समझता था वो क़ा़तिल होगा ज़़मीं से फूट के मेरा लहू पुकार करे डर गया मौत से जो शख़्स वो बुज़दिल होगा न जाने कितनी किश्तियाँ भँवर में डूब गयीं किसी-किसी की ही तक़दीर में साहिल होगा किसी पत्थर के सामने पटक रहा क्यों सर तेरी फ़रियाद सुनेगा जो रहमदिल होगा

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