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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

यहाँ हर कदम पे ख़तरा है

डी एम मिश्र

ऐ मेरी जान यहाँ हर कदम पे ख़तरा है जिधर भी देखता हूँ का़तिलों का पहरा है मुद्दतों से मुझे जिसका था इंतजा़र बहुत मेरा माशूक़ रकी़बों के घर में ठहरा है गुज़र गयी जो रात तीन पहर तब देखा कि आज चाँद लबेबाम इधर उतरा है इसे वहम कहूँ कि मान लूँ हकीक़त या जिसे देखा था कल भी क्या ये वही चेहरा है चलूँ कैसे तुम्हारे साथ यही सोच रहा मेरे घर का सभी सामान अभी बिखरा है बडे़ पेडो़ं को सोचने की जरूरत शायद ग़रीब दूब को आँधी से कहाँ ख़तरा है कहाँ गुहार लगाऊँ , कहाँ अर्जी़ डालूँ यहाँ का हुक्मराँ कुछ सुनता नहीं बहरा है

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